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January 26, 2026 5:10 am

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काग़ज़ों में कानून, ज़मीन पर दबंगई! रतनपुर में आदिवासी किसान की पुश्तैनी ज़मीन पर ‘तंत्र’ का साया ,तहसीलदार–राइस मिल गठजोड़ का आरोप, कलेक्टर से न्याय की गुहार

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Ravi Thakur

रतनपुर/बिलासपुर।
छत्तीसगढ़ की आदिवासी पहचान और संवैधानिक अधिकारों की बात करने वाले इस राज्य में अगर एक आदिवासी किसान को अपनी ही पुश्तैनी ज़मीन बचाने के लिए दफ़्तर–दफ़्तर भटकना पड़े, धमकियाँ सहनी पड़ें और फिर भी न्याय न मिले—तो सवाल सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, पूरे प्रशासनिक तंत्र की संवेदनशीलता पर खड़ा होता है। रतनपुर तहसील क्षेत्र से सामने आया यह मामला न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि यह बताने के लिए काफी है कि किस तरह रसूखदारों के आगे नियम–कानून बौने साबित हो रहे हैं।

वार्ड क्रमांक 03 महामाया पारा निवासी आदिवासी किसान कैलाश बाबू नागरची ने तहसीलदार रतनपुर एवं स्थानीय राइस मिल संचालक पर गंभीर आरोप लगाते हुए जिला कलेक्टर बिलासपुर को लिखित शिकायत सौंपी है। किसान का आरोप है कि उनकी पुश्तैनी भूमि को हड़पने के उद्देश्य से प्रशासनिक संरक्षण में बार-बार सीमांकन कराया जा रहा है और विरोध करने पर मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है।शिकायत के अनुसार, कैलाश बाबू नागरची की भूमि खसरा नंबर 653/3, 653/5, 3376, 653/6, 653/50, 653/48 में दर्ज है, जिस पर वे वर्षों से काबिज हैं। आरोप है कि अनमोल राइस मिल रतनपुर के संचालक अनिल दुग्गा द्वारा तहसीलदार की भूमिका के साथ अवैध तरीके से उनकी भूमि को मिल परिसर में शामिल करने की कोशिश की जा रही है।

पीड़ित किसान का कहना है कि सीमांकन के दौरान नियमों की अनदेखी करते हुए उनकी जमीन के हिस्से को बार-बार शामिल किया गया। जब उन्होंने आपत्ति दर्ज कराई, तो पुलिस बुलाने और अंदर कर देने जैसी धमकियाँ दी गईं। हैरानी की बात यह है कि किसान के पास सभी वैध राजस्व दस्तावेज मौजूद होने के बावजूद उसकी बात को दरकिनार कर दिया गया।नागरची ने अपनी शिकायत में यह भी उल्लेख किया है कि संबंधित राइस मिल की भूमि 25–30 वर्ष पूर्व औद्योगिक प्रयोजन से क्रय की गई थी, लेकिन अब उसके विस्तार की आड़ में आसपास के किसानों की निजी भूमि पर अनावश्यक दावा किया जा रहा है, जो कानूनन गलत है।

किसान ने कलेक्टर से निष्पक्ष राजस्व टीम गठित कर दोनों पक्षों की भूमि का अलग-अलग सीमांकन कराने, राइस मिल की वास्तविक भूमि की जांच कराने तथा तहसीलदार एवं मिल संचालक की भूमिका की जांच कर सख्त कार्रवाई करने की मांग की है।इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आदिवासी किसान की जमीन आज भी सुरक्षित है, या रसूख और पद के आगे उसकी आवाज़ दबा दी जाएगी?

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