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March 19, 2026 9:05 am

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खैरा में जीवंत हुई गोंडी परंपरा, बड़ादेव की आस्था में एकजुट हुआ पूरा गांव

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Ravi Thakur

खैरा रतनपुर
जब ढोल-मांदर की थाप गूंजी, पारंपरिक गीतों की स्वर लहरियां उठीं और रंग-बिरंगे परिधानों में सजे ग्रामीण नृत्य में झूम उठे—तब यह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि गोंडी आदिवासी संस्कृति की जीवंत कहानी बन गई। विकासखंड कोटा अंतर्गत ग्राम पंचायत खैरा में आयोजित कुल देवता बड़ादेव महापूजन एवं ईशर गौरी-गौरा पूजन ने आस्था, परंपरा और सामाजिक एकता की अनुपम मिसाल पेश की।


सदियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार कार्यक्रम की शुरुआत प्रकृति से जुड़ी पवित्र रस्मों के साथ हुई। जंगल और धरती से लाई गई मिट्टी को श्रद्धा के साथ पूजित कर, उसी से गौरी-गौरा की सुंदर प्रतिमाएं गढ़ी गईं। सुसज्जित मंडप में पारंपरिक विवाह संस्कार पूरे किए गए, जहां हर मंत्र और हर रस्म में आदिवासी समाज की सांस्कृतिक आत्मा झलकती रही।
लोकगीतों और वाद्ययंत्रों के साथ जब बारात निकली तो पूरा गांव उत्सव में बदल गया। महिलाएं, पुरुष, बुजुर्ग और बच्चे—सभी गाजे-बाजे की धुन पर थिरकते हुए आस्था की इस यात्रा का हिस्सा बने। यह दृश्य न केवल देखने योग्य था, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए संस्कृति को सहेजने का संदेश भी दे रहा था।


कार्यक्रम में पहुंचे कोटा विधायक अटल श्रीवास्तव ने कहा कि बड़ादेव महापूजन और ईशर गौरी-गौरा पूजन आदिवासी समाज की पहचान हैं। ऐसे आयोजनों से हमारी सभ्यता और संस्कृति जीवित रहती है तथा समाज में आपसी भाईचारा मजबूत होता है। उन्होंने ग्राम के सामाजिक विकास को नई दिशा देते हुए मंगल भवन निर्माण के लिए 10 लाख रुपये की घोषणा की, जिससे ग्रामीणों में खुशी की लहर दौड़ गई।
कार्यक्रम की अध्यक्षता ग्राम सरपंच सुश्री सुकृता पोर्ते एवं गोंडवाना सोसायटी केंद्र खैरा के अध्यक्ष जगन्नाथ सिंह आर्मो ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में जिला पंचायत सदस्य श्रीमती रजनी पिंटू मरकाम, यासीन खान, कृष्णा साहू, संतोष साहू, मिथिलेश दास मानिकपुरी सहित अनेक जनप्रतिनिधि व सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद रहे।
इस भव्य आयोजन को सफल बनाने में कृष्णा पोर्ते, रामजी राज, कैलाश चंद्र पोर्ते, सतपाल पोर्ते, शिव कुमार राज, बलराम पोर्ते, शत्रुघ्न मरकाम, सरजू पोर्ते, मोती जगत, रामपाल पोर्ते, बिसाहू पोर्ते सहित समाज के लोगों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। बड़ी संख्या में ग्रामीणों की सहभागिता ने यह सिद्ध कर दिया कि जब परंपरा, आस्था और एकता साथ चलती हैं तो संस्कृति स्वयं बोल उठती है ।

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