अमाली में कोल वॉशरी पर बवाल: ईआईए रिपोर्ट पर सवाल, जनसुनवाई को बताया ‘फर्जी’
बिलासपुर | कोटा
कोटा विधानसभा क्षेत्र के अमाली अंचल में प्रस्तावित कोल वॉशरी परियोजना अब महज़ एक औद्योगिक प्रस्ताव नहीं, बल्कि पर्यावरण, जल, जंगल और आजीविका से जुड़ा एक बड़ा जन सरोकार बन चुकी है। पर्यावरणीय जनसुनवाई से पहले ही जिस तरह से कंपनी की ईआईए (EIA) रिपोर्ट, स्थल चयन और प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो रहे हैं, उसने प्रशासनिक पारदर्शिता और पर्यावरणीय नियमों की गंभीर परीक्षा ले ली है। परियोजना के विरोध में ग्रामीणों का आक्रोश अब सड़कों से निकलकर कलेक्टोरेट तक पहुंच गया है। मंगलवार को बड़ी संख्या में ग्रामीण बिलासपुर कलेक्टर कार्यालय पहुंचे और कोल वॉशरी के खिलाफ कड़ा विरोध दर्ज कराते हुए जनसुनवाई को “औपचारिक और भ्रामक” करार दिया। ग्रामीणों का आरोप है कि जमीनी सच्चाई को नजरअंदाज कर रिपोर्ट तैयार की गई है और जनसुनवाई महज़ कानूनी खानापूर्ति बनकर रह गई है।
कोल वॉशरी को लेकर ग्रामीणों का कहना है कि कंपनी की ईआईए रिपोर्ट में अरपा बैराज की दूरी 6.30 किलोमीटर दर्शाई गई है, जबकि वास्तविक दूरी इससे कहीं कम है। यदि यह परियोजना शुरू होती है तो अरपा बैराज सहित आसपास के जलस्रोतों के प्रदूषित होने का खतरा बढ़ जाएगा, जिससे सिंचाई, पेयजल और जलीय जीवों पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। इसके साथ ही पहाड़ों की कटाई से जंगल, औषधीय पौधों और वन्यजीवों के अस्तित्व पर संकट गहराने की आशंका जताई गई है।ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि कोटा क्षेत्र ग्रीन बेल्ट घोषित इलाका है, जहां समृद्ध वन क्षेत्र, पहाड़ और जैव विविधता मौजूद है। इसके बावजूद इस क्षेत्र को औद्योगिक गतिविधियों के लिए तैयार किया जा रहा है। ईआईए रिपोर्ट में जोगीपुर स्थित राष्ट्रीय उद्यान और आसपास के प्राचीन मंदिरों का समुचित उल्लेख नहीं किया गया है, जबकि कुछ धार्मिक स्थल प्रस्तावित उद्योग से महज़ 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं।
कोल वॉशरी के संभावित प्रभावों को लेकर किसानों की चिंता भी गहराती जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि अमाली क्षेत्र से जुड़े चेचरी डैम, कोरी डैम सहित कई जलाशयों के पानी के दूषित होने की आशंका है। इससे खेती प्रभावित होगी, धान की फसल खराब होने का खतरा बढ़ेगा और ग्रामीणों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।


सबसे गंभीर आरोप यह है कि जनसुनवाई से पहले ही लगभग 35 एकड़ भूमि पर अवैध निर्माण, बोर खनन और तालाब निर्माण करा लिया गया है, जो पर्यावरणीय नियमों और कानूनी प्रक्रियाओं का खुला उल्लंघन है। वहीं कुछ लोगों की निजी जमीन पर बिना पंजीयन कब्जा किए जाने के आरोप भी सामने आए हैं।
ग्रामीणों ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि जिस शासकीय निरंजन केशरवानी महाविद्यालय में जनसुनवाई आयोजित की गई, उसका नाम तक कंपनी की ईआईए रिपोर्ट में दर्ज नहीं है, जबकि यह स्थल प्रस्तावित परियोजना क्षेत्र से मात्र लगभग 300 मीटर की दूरी पर स्थित है।
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि इस “फर्जी और भ्रामक” जनसुनवाई को तत्काल निरस्त किया जाए और संबंधित कंपनी के खिलाफ पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत सख्त कार्रवाई की जाए। चेतावनी दी गई है कि यदि उनकी मांगों पर शीघ्र ध्यान नहीं दिया गया तो समस्त ग्रामीण न्यायालय की शरण लेने के साथ-साथ व्यापक जन आंदोलन शुरू करने को बाध्य होंगे, जिसकी संपूर्ण जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।

