गौरेला–पेंड्रा–मरवाही | 9 जनवरी 2026
मैकल की पहाड़ियों पर उस शाम सिर्फ एक कार का शीशा नहीं टूटा था — टूटा था डर का भ्रम, और टकराया था सच, सत्ता और माफिया का घमंड। 8 जनवरी की ढलती शाम, जब जंगलों पर पड़ती सूरज की आखिरी सुनहरी किरणें शांत हो रही थीं, उसी वक्त धनौली गांव के पास सड़क पर एक और तरह का अंधेरा उतर आया। अवैध खनन की जमी हुई धूल को उजागर कर लौट रहे पत्रकार सुशांत गौतम को हाईवा, फोर-व्हीलर और कार से घेर लिया गया। चारों तरफ से बंद रास्ता… और बीच में खड़ी थी सच की गाड़ी।लोहे की रॉड का एक वार — और ड्राइवर साइड का शीशा चकनाचूर। काँच के टुकड़े चेहरे पर लगे, माथे से खून टपका… लेकिन आँखों में डर नहीं, बल्कि सवाल और भी गहरा हो गया। यह हमला गुस्से का नहीं था, यह सच को कुचलने की साजिश थी।
हमलावरों ने सहयोगी रितेश गुप्ता का मोबाइल छीनकर बंद कर दिया, जैसे आवाज़ ही छीन लेना चाहते हों। कैमरा, रिकॉर्डिंग, सबूत — सब मिटाने की कोशिश हुई, पर घटना की सच्चाई मिट नहीं सकी।


घायल अवस्था में भी सुशांत सीधे गौरेला थाने पहुँचे। पुलिस ने FIR 0014/2026 दर्ज कर हत्या के प्रयास सहित गंभीर धाराएँ लगाई हैं। मामले में जयप्रकाश शिवदासानी (जेठू), ललन तिवारी और सुनील बाली नामजद हैं — जिनका नाम अवैध खनन नेटवर्क से जुड़ा बताया जा रहा है।
यह हमला सिर्फ एक पत्रकार पर नहीं था।
यह हमला उन नदियों पर था जिनका पानी सूख रहा है, उन जंगलों पर था जो कट रहे हैं, और उस लोकतंत्र पर था जिसमें सवाल पूछना अपराध बनता जा रहा है।
मैकल के पहाड़ गवाह हैं —
शीशा टूट सकता है…
गाड़ी रुक सकती है…
पर सच की रफ्तार नहीं।
आज सुशांत जिंदा हैं। कल शायद कोई और न बचे — अगर हम सब नहीं बोले।